सपा-सुभासपा की दोस्ती रोक पायेगी भाजपा को सत्ता में वापसी से

आगामी होने वाले विधानसभा चुनाव के लेकर जहाँ तमाम राजनीतिक दल अपनी जमीन तैयार करना शुरू कर दिये है । वही समाजवादी पार्टी व सुभासपा के बीच हुये राजनीतिक समझौते ने ऊतर प्रदेश की राजनीति में नया मोड ला दिया है । वही ये तो आगामी विधान सभा चुनाव बताएगा कि सुभासपा के बिना भाजपा सत्ता में वापसी करती है या सुभासपा के सहारे सपा सत्ता में पहुँचती है
2017 विधान सभा में फेल हो गया था गठबंधन
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दो बार गठन्धन रणनीति फेल हो चुकी है सपा ने विधान सभा चुनाव 2017 में कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया सत्ता में पुनः वापसी के लिये मगर वह पूरी तरह से फेल हो गया और भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला और भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी सत्ता हासिल कर ली।
2019 लोकसभा में भी फेल हो गया सपा बसपा गठबंधन
2019 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उत्तर प्रदेश में मोदी लहर को रोकने के लिये बसपा से हाथ मिला लिया। लेकिन सपा का ये प्रयोग पूरी तरह से फेल रहा है। जहाँ बसपा का 2014 के लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ हो गया तो वही बसपा से गठबंधन के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के परिवार के कई सदस्य चुनाव हार गये।
2022 के चुनाव एक बार फिर गठबंधन राजनीति
दो बार बड़े राजनीतिक दलों से गठबंधन के बाद जहाँ सपा को कुक्ष नही मिला तो वही बड़े दलों के साथ गठबंधन की रणनीति फेल रही। इस बार सपा सुप्रीमो ने बड़े राजनीतिक दलों से गठबंधन करने से दूरी बनाये हुये है। तो वही छोटे दलों के साथ मिलकर एक बार फिर 2022 में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचना चाहते है।
सुभासपा के बिना पार होगी भाजपा की नैया
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा व सुभासपा के मिलकर चुनाव लड़ा और पूरी तरह से उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को बदल कर रख दिया। भाजपा व सुभासपा गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और कई राजनीतिक दल सैकड़ा का आंकड़ा भी नही पार कर पाएं।
राजभर वोटरों में अच्छी पकड़ मानी जाती है ओमप्रकाश राजभर की
ओमप्रकाश राजभर सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष है और माना जाता है कि सुभासपा के राजभर वोटरों में अच्छी पकड़ है और ऊतर प्रदेश के कई विधान सभा सीटो पर राजभर वो ट की भूमिका अहम है।

